अक्षय कुमार नहीं, ये स्कूल ड्रॉपआउट है असली ‘पैडमैन’

बॉलीवुड के सुपरस्टार खिलाड़ी कुमार उर्फ़ अक्षय कुमार अपने करियर के बेहतरीन दौर से गुजर रहे हैं।

2 weeks ago
अक्षय कुमार नहीं, ये स्कूल ड्रॉपआउट है असली ‘पैडमैन’

बॉलीवुड के सुपरस्टार खिलाड़ी कुमार उर्फ़ अक्षय कुमार अपने करियर के बेहतरीन दौर से गुजर रहे हैं। ऐक्शन फिल्मों से शुरुआत करने वाले अक्षय हमेशा अपने आप को अलग - अलग तरह के किरदार निभा के बेहतरीन अभिनेता साबित कर चुके हैं। ऐक्शन फिल्मों के बाद कॉमेडी और फिर पिछले कुछ दिनों से सामाजिक सरोकार से सम्बंधित फिल्मों में काम कर अक्षय की बेहतरीन फिल्मों की सूची ओर लम्बी हो गई है।

पिछले कुछ दिनों से अक्षय कुमार की आने वाली फिल्म पैडमैन चर्चा में है। ये फिल्म 26 जनवरी को रिलीज होगी। इस फिल्म की कहानी एक वास्तविक घटना पर आधारित है। सच में कोई इंसान है जिसे लोग पैडमैन के नाम से जानते हैं।

आइये जानते हैं वास्तविक पैडमैन की कहानी

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इस कहानी का मुख्य किरदार ‘अरूणाचलम मुरूगनंतम’ है। इन्ही के जीवन की कहानी पर आधारित है अक्षय की फिल्म पैडमैन। इस कहानी की शुरुआत एक छोटे से गांव से हुई जहाँ महगाई के कारण पीरियड्स के समय महिलायें पैड का उपयोग करने में सक्षम नहीं थीं। ये सच भी है कि गांव के लोगों की आमदनी इतनी ज्यादा नहीं होती है की उसे वो हर महीने महिलाओं के पैड खरीदने में खर्च कर सके। ग्रामीण महिलाओं की इसी समस्या को समझकर पैडमैन अरूणाचलम मुरूगनंतम ने इसका हल खोज निकाला।

प्रारंभिक जिंदगी

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अरूणाचलम मुरूगनंतम का जन्म 1962 में कोयम्बटूर तामिलनाडु में हुआ, इनका परिवार गरीब था। इनके पिता का बचपन में ही एक सड़क दुर्घटना में निधन हो गया। पिता की मृत्यु के बाद इनकी माँ ने मजदूरी करके इन्हे पाला। जब मुरूगनंतम 14 वर्ष के थे तो उन्हें उनके स्कूल से निष्कासित कर दिया गया। इसके बाद घर की जिम्मेदारियों के कारण इन्हे अलग - अलग नौकरियां करनी पड़ी।

सस्ते सैनेटरी नैपकीन बनाने की कहानी

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अरूणाचलम मुरूगनंतम की शादी 1998 में शांति नाम की महिला से हुई। एक दिन की बात है जब मुरूगनंतम अपने घर पर खाना खाने के बाद आराम कर रहे थे, तब उन्होंने अपनी पत्नी को कुछ छुपाकर ले जाते देखा, मुरूगनंतम ने पत्नी से पूछ लिया “वह क्या हैं?” इस पर उनकी पत्नी ने बड़े अजीब स्वर में जवाब दिया ‘इससे आपका कोई मतलब नही हैं’। मुरूगनंतम के थोड़ा जोर देने पर उन्हें एक बहुत ही गन्दा कपड़ा दिखा जिससे वो खुद मोटरसाइकिल पोछते थे, उन्हें ये समझने में देर नहीं लगी की इस कपड़ो का इस्तेमाल उनकी पत्नी ने अपने पीरियडस के लिए किया हैं। 

इसके बाद मुरूगनंतम ने अपनी पत्नी से पूछा ‘ तुम सैनेटरी नैपकीन का इस्तेमाल क्यों नही करती हो’? ऐसे गंदे कपडे से तो तुम बीमार पड़ सकती हो। इसपर उनकी पत्नी ने बोलै ‘अगर मैं नैपकिन का इस्तेमाल करुँगी तो घर के बाकी खर्चो पर इसका बुरा असर पड़ेगा। 

पत्नी की बातें सुनकर मुरूगनंतम एक दूकान गए और सैनेटरी नैपकीन एक पैकेट माँगा, दुकानदार ने ब्रांड पूछा और फिर मेरे किसी एक ब्रांड के पैकेट की तरफ इशारा करने के बाद उसने उन्हें वो पैकेट दे दिया। 

अब मुरूगनंतम ने इस सैनेटरी नैपकीन पर रिसर्च करना शुरू किया। जो पैकेट उन्होंने लिया था उसकी कीमत चार रूपये थी जबकि उसके अंदर दस कॉटन थे। अगर बाजार से दस ग्राम कॉटन खरीदी जाए तो उसकी कीमत मुश्किल से दस पैसे पड़ेगी। यही से उनके दिमाग में अपनी पत्नी के लिए सस्ते नैपकीन बनाने की बात आ गई। 

सस्ते सैनेटरी नैपकीन की मशीन बनाने में मुरूगनंतम को 2 साल के करीब का वक़्त लगा। इस दौरान उन्हें बहुत बार निराशा का भी सामना करना पड़ा पर कठिन वक़्त में भी उन्होंने कभी हार नहीं मानी और आखिरकार सबसे सस्ते सैनेटरी नैपकिन बनाने वाली मशीन बना ही ली। 

रखी जयश्री इंडस्ट्रीज की नीव

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अरूणाचलम मुरूगनंतम ने कम कीमत वाली सैनेटरी नैपकीन का उत्पादन करने वाली मशीन और इसके तकनीकी के अपने सुझावों को साल 2006 में आईआईटी मद्रास के समक्ष रखा। IIT मद्रास ने इसे फिर नेशनल इनोवेशन अवार्ड के लिए भेजा। 

इस अवार्ड के लिए हजारो आइडियाज आये थे जिनमे मुरूगनंतम को पहला स्थान मिला। पुरस्कृत होने के बाद मुरूगनंतम ने जयश्री इंडस्ट्रीज की नीव रखी। जयश्री इंडस्ट्रीज में निर्मित हजारों मशीनें अब पूरे देश में चल रही है। इस अनूठे अविष्कार को खरीद लेने के लिए कई बड़ी कंपनी ने कोशिश की पर मुरूगनंतम ने अपने इस आविष्कार को बेचने से इंकार कर दिया।

पुरस्कार और सम्मान

Source = Theweek

अरूणाचलम मुरूगनंतम (6.1-2) ने अब तक विश्व की कई संस्थानों में अपने इस आविष्कार पर व्याख्यान दे चुके हैं। इस संस्थानों में मुख्य हैं आईआईटी बैंगलोर, आईआईटी बॉम्बे, आईआईएम अहमदाबाद और हावर्ड विश्वविद्यालय। इस अनूठे और समाजोपयोगी आविष्कार के लिए भारत सरकार ने मुरूगनंतम को पद्मश्री से पुरस्कृत किया है। साल 2014 में टाइम पत्रिका ने इन्हे विश्व के 100 सबसे प्रभावशाली लोगों की सूची में शामिल किया।

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