पंच केदार – केदारनाथ के सामान पुण्य देने वाले चार अन्य केदार

उत्तराखंड को देवभूमि के नाम से भी जाना जाता है। हिन्दू धर्म से जुड़े कई तीर्थ स्थान उत्तराखंड में अवस्थित हैं।

7 months ago
पंच केदार – केदारनाथ के सामान पुण्य देने वाले चार अन्य केदार

उत्तराखंड को देवभूमि के नाम से भी जाना जाता है। हिन्दू धर्म से जुड़े कई तीर्थ स्थान उत्तराखंड में अवस्थित हैं। केदारनाथ, बद्रीनाथ, गंगोत्री, यमनोत्री के जैसे कई महत्वपूर्ण तीर्थ स्थल यहाँ विद्यमान हैं। केदारनाथ को भगवान शिव का एक बड़ा तीर्थ स्थल माना जाता है, पर क्या आप जानते हैं वास्तविक केदारनाथ की तरह हीं चार और केदारनाथ उत्तराखंड में हीं अलग अलग स्थानों पर मौजूद हैं। धर्म शास्त्रों में केदारनाथ मंदिर का बहुत महत्व है, और ऐसा माना जाता है की उत्तराखंड में हीं मौजूद चार दूसरे केदारनाथ मंदिरों का धार्मिक महत्त्व भी बिलकुल मुख्य केदारनाथ मंदिर के जैसा हीं है। ये चार केदार नाथ है.. तुंगनाथ स्थित महादेव, रुद्रनाथ, कल्पेश्वर एवं श्री मध्यमहेश्वर। माना जाता है की ये चारो स्थल भी मुख्य केदारनाथ के हीं अंश हैं।

हिन्दू ग्रन्थ शिवपुराण में ऐसा लिखा है की महाभारत के ऐतिहासिक युद्ध के पश्चात पांडव स्वगोत्र और स्वसम्बन्धियों की हत्या के पाप का प्रायश्चित करने के लिए उत्तराखंड के इन्हीं स्थलों पर तपस्या करने पहुंचे थे। यहाँ तपस्या करने के लिए उन्हें महर्षि वेद व्यास ने आज्ञा दी थी। स्वसम्बन्धियों और रिश्तेदारों के वध के दोषी पांडवों को भगवान भोलेनाथ दर्शन देना हीं नहीं चाहते थे।

एक बार की बात है भगवान शिव महिष (भैंसे) के रूप में पृथ्वी में समा रहे थे। ऐसा करते हुए पांडवों ने उन्हें देखा और पहचान लिया। इसके बाद महाबली भीम ने भगवान शिव को धरती के अंदर आधा समाया हुआ पकड़ा। इस घटना के बाद पांडवों से खुश हो कर भगवान शिव ने उन्हें दर्शन दिए और स्वसम्बन्धियों की हत्या के दोष से भी मुक्ति दे दी। तभी से भगवान महादेव शिव का पृष्ठ भाग शिला के रूप में केदारनाथ में अवस्थित हैं, और उनका पृथ्वी में समाया हुआ अग्र भाग नेपाल में अवतरित हुआ जिसे पशुपतिनाथ के नाम से जाना गया। ऐसे हीं भगवान शिव की बाहें तुंगनाथ में प्रकट हुई, मुख रुद्रनाथ क्षेत्र में, जटाएँ कपलेश्वर में और नाभि का अवतरण  मध्यमहेश्वर में हुआ। 

जानते हैं बिस्तार से भगवान महादेव के इन्ही पंच केदार के बारे में।

केदारनाथ

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पंच केदारों में सर्वप्रमुख है केदारनाथ। इसे मुख्य केदारपीठ और पंच केदारों में प्रथम भी कहा जाता है। पुराणों में दर्ज तथ्यों के अनुसार महाभारत के भीषण युद्ध के पश्चात महर्षि वेदव्यास की आज्ञा प्राप्त कर के पांडवों ने यहाँ स्वसम्बन्धियों की हत्या के दोष से मुक्ति के लिए भगवान महादेव की आराधना की थी। यहाँ भगवान शिव के महिषरूप का पिछला भाग एक शिला की शक्ल में मौजूद है जिसकी पूजा अर्चना करने देश दुनिया से सनातन धर्मातवलम्बी लोग यहाँ आते हैं। 

कब करें यात्रा

हिमालय पर्वत की खूबसूरत वादियों में अवस्थित केदारनाथ की  यात्रा अप्रैल महीने से अक्टूबर महीने तक की जा सकती है। सर्दियों में यहाँ भीषण बर्फ-बारी, बारिश, तूफ़ान और भूस्खलन होते रहते हैं इसलिए इस क्षेत्र में सर्दियों के मौसम में कोई नहीं रहता और मुख्य मंदिर के भी कपाट बंद कर दिए जाते हैं। वैसे अप्रैल और अक्टूबर के दौरान आने वाले बारिश के मौसम में भी केदारनाथ की यात्रा करने से बचना चाहिए। 

कैसे पहुंचे वहां

केदारनाथ के पास का नज़दीकी हवाई अड्डा देहरादून है। देहरादून से हरिद्वार आप रेल मार्ग या फिर सड़क मार्ग से भी जा सकते हैं। केदारनाथ जाने के लिए सबसे पास का रेलवे स्टेशन हरिद्वार है। इसके आगे का मार्ग सड़क से पूरा किया जाता है। वैसे केदार नाथ की चढ़ाई बहुत कठिन है। सड़क मार्ग में भी कई तीखे मोड़ और खाइयां आती हैं। कई श्रद्धालु इस चढ़ाई को पैदल हीं पूरा करते हैं।

आस-पास के प्रसिद्द स्थान

उखीमठ

रुद्रप्रयाग जिले का यह तीर्थ स्थल समुद्र से 1317 मीटर की ऊंचाई पर स्थित है। सर्दियों के मौसम में केदारनाथ मंदिर और मध्यमहेश्वर मंदिर से मूर्तियों को डोली में उठा कर उखीमठ लाया जाता है। छह महीने तक उखीमठ में हीं इन मूर्तियों की पूजा होती है। कहा जाता है की बाणासुर की पुत्री उषा और भगवान कृष्णा के पौत्र अनिरुद्ध का विवाह इसी मंदिर में हुआ था । बाणासुर की पुत्री उषा के नाम के कारण हीं इस स्थान का नाम उखीमठ रखा गया था। 

गंगोत्री

जीवनदायनी नदी गंगा का उद्गम है गंगोत्री समुद्र से 3042 मीटर ऊंचाई पर अवस्थित है। उत्तरकाशी के करीब 100 किलोमीटर दूर अवस्थित यह स्थान मई महीने से अक्टूबर महीने के मध्य में जाया जा सकता है। लाखो श्रद्धालु इसी दौरान यहाँ आ कर गंगा मैया के दर्शनों का लाभ उठाते हैं।


मध्यमेश्वर

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मनमहेश्वर और मदनमहेश्वर के नामों से भी ये स्थान जाना जाता है। पंच केदार का यह दूसरा प्रमुख स्थल कहलाता है। महिषरूपी भगवान महादेव यहां नाभि लिंग के रूप में विद्यमान हैं। कुछ प्राचीन धार्मिक कथाओं में भी यहाँ से जुड़ी कथाएं वर्णित हैं। एक कथा के अनुसार यही वो स्थान है जहाँ भगवान महादेव ने अपनी मधुचन्द्र रात्रि मनाई थी। ऐसा माना जाता है की यहां विद्यमान जल की कुछ बूँद हीं आपको मोक्ष दिलाने के लिए काफी होती हैं। 

कब करें यात्रा

यहाँ भी सर्दियों के मौसम में परिस्थितियां बहुत विषम होती हैं इसीलिए यहाँ जाने का सबसे बेहतर और सुरक्षित समय गर्मियों में हीं माना जाता है। सर्दियों में यहाँ का तापमान बहुत ज्यादा गिर जाता है और बारिश के मौसम में यहाँ जाने वाली सड़कों पर भूस्खलन का खतरा बढ़ जाता है। मुख्यतः यहाँ की यात्रा मई महीने से शुरू होती है और अक्टूबर तक चलती है।

कैसे पहुंचे वहां

यहाँ से देहरादून का जॉली ग्रांट एयरपोर्ट करीब 200 किलोमीटर दूर स्थित है। वहीं यहाँ से सबसे नज़दीकी रेलवे स्टेशन ऋषिकेश है जो करीब 200 किलोमीटर दूरी पर अवस्थित है। रेल और हवाई सफर के बाद आप सड़क मार्ग से उनीअना तक जा सकते हैं। उनीअना से मद्यमेश्वर सिर्फ 21 किलोमीटर की दूरी पर पड़ता है। 

आस-पास के प्रसिद्द स्थान


बूढा मध्यमेश्वर

मध्यमेश्वर के समीप ही पर्वत की एक चोटी है, इस चोटी के रास्ते में ढलान अपेक्षाकृत कम कठिनाइयों वाले होते है और इसके रास्ते में पेड़ भी न के बराबर हैं। इसके रास्तों की ढलान पर उत्तराखंड में पाई जाने वाली एक घास ‘बुग्याल’ की मखमली चादर सी बिछी हुई लगती है । इस चोटी के रास्ते पर डेढ-दो किलोमीटर ऊपर की तरफ चलने पर एक छोटा मंदिर दीखता है, इसे हीं बूढा मध्यमेश्वर के नाम से जाना जाता हैं।

कंचनी ताल

मध्यमेश्वर मंदिर से 16 किलोमीटर की दुरी पर अवस्थित कंचनी ताल एक खूबसूरत झील है। ये झील समुद्र से 4200 मीटर की ऊचाई पर अवस्थित है। पहाड़ी फूलों से भरा हिमालय पर्वत पर अवस्थित ये झील बड़ा हीं मनोरम और दर्शनीय है। 

गउन्धर

गउन्धर दो हिमालयी नदियों का संगम स्थल है। ‘मध्यमेश्वर गंगा’ तथा ‘मरकंगा गंगा’ गउन्धर में आ कर एक दूसरे से मिल जाती है।

तुंगनाथ

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तुंगनाथ एक पर्वत है जो उत्तराखंड के रुद्रप्रयाग जिले में स्थित है। इसी पर्वत पर अवस्थित है तुंगनाथ जी का मंदिर। ये मंदिर समुद्र की सतह से 3680 मीटर की ऊँचाई पर स्थित है। यह मंदिर पंच केदारों में सबसे ऊंचाई पर अवस्थित है । इस मंदिर को  1000 वर्ष पहले बनाया गया था।लोगो का मानना है की इस मंदिर का निर्माण महाभारत युद्ध के पश्चात पांडवों ने भगवान शिव को खुश करने के लिए किया था, जो उस समय युद्ध में हुए हत्याओं के कारण पाण्डवों से बहुत नाराज थे। तुंगनाथ की इस चोटी से तीन धाराएं फूटती हैं और इन्ही धाराओं से अक्षकामिनी नाम की नदी बनती है। 

कब करें यात्रा

तुंगनाथ की यात्रा के लिए सबसे बेहतर वक़्त मार्च माह से अक्टूबर माह तक का समय माना जाता है। बाकी दिनों में यहाँ तापमान अत्यधिक गिर जाता है इसीलिए उस समय यहाँ की यात्राएं बंद कर दी जाती हैं। बरसात के मौसम में भी यहाँ की यात्राएं नहीं करनी चाहिए। 

कैसे पहुंचे वहां

तुंगनाथ से सबसे नज़दीकी हवाई अड्डा देहरादून का जॉली ग्रांट हवाई अड्डा है। हरिद्वार से सड़क मार्ग से तुंगनाथ की यात्रा आराम से की जा सकती है। जहाँ तक बात रेल की करें तो तुंगनाथ से सबसे नज़दीकी रेलवे स्टेशन है हरिद्वार है । सड़क मार्ग से भी हरिद्वार तक पहुँचना आसान है।

आस-पास के प्रसिद्द स्थान 

चन्द्रशिला शिखर

तुंगनाथ मंदिर प्रांगण से करीब 2 किलोमीटर की ऊचाई पर अवस्थित है चन्द्रशिला नाम की शिखर । यह बड़ा हीं खूबसूरत और रमणीक पर्वतीय इलाका है । तुंगनाथ के दर्शनों के बाद आप यहाँ आ कर भी कुछ वक़्त गुजार सकते हैं। 

गुप्तकाशी

रुद्रप्रयाग-गौरीकुण्ड राष्ट्रीय राजमार्ग पर अवस्थित एक सुन्दर कस्बा है गुप्तकाशी । यह समुद्र तल से 1319 किलोमीटर की ऊंचाई पर स्थित है। यहाँ भगवान शिव का एक मंदिर है जिसका नाम विश्वनाथ मंदिर है।

रूद्रनाथ

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पंच केदारों में चौथे नंबर पर आते हैं रूद्रनाथ। यहां महिषरूपी भगवान भोलेनाथ का मुख विद्यमान है। श्रद्धालु यहाँ भगवान शिव के मुख रूप की आराधना करते हैं। तुंगनाथ की चोटी से रुद्रनाथ की शिखर साफ़ दिखाई देती है। रुद्रनाथ चुकी एक गुफा में अवस्थित हैं इसलिए यहाँ तक पहुँचने में बहुत परेशानियों का सामना करना पड़ता है। यहाँ पहुँचने का मार्ग दुर्गम है। 

कब करें यात्रा

रुद्रनाथ की यात्रा के लिए मार्च से अक्टूबर तक का वक़्त ज्यादा बेहतर होता है। पर इस दौरान भी बारिश के मौसम में इस यात्रा को नहीं करना चाहिए। मुख्यतः बसंत और गर्मी के मौसम में हीं ये यात्रा करनी चाहिए। 

कैसे पहुंचे वहां

यहाँ से सबसे नजदीकी हवाईअड्डा देहरादून है। हवाई जहाज से देहरादून पहुँचने के बाद सड़क या रेल मांग के जरिये ऋषिकेश तक की यात्रा की जा सकती है। ऋषिकेश से आगे की यात्रा सड़क मार्ग के द्वारा किया जा सकता है। रुद्रनाथ तक सड़क मार्ग से सीधे पहुंचने के लिए हरिद्वार, ऋषिकेश और देहरादून जैसे मुख्य शहरों से सीधी बसें चलती हैं।

कल्पेश्वर

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पंच केदारों में पांचवें नंबर पर आने वाला है कल्पेश्वर। कल्पेश्वर में महिषरूपी शिव के जटाओं की उपासना की जाती है। अलखनंदा ब्रिज से तकरीबन 6 मील आगे जा कर कल्पेश्वर नाम का स्थान आता है। ये स्थान उसगम नाम से भी प्रसिद्ध है। यहाँ अवस्थित मंदिर के गर्भगृह तक जाने के पथ में प्राकृतिक गुफा पड़ती है। 

कब करें यात्रा

कल्पेश्वर के मंदिर की यात्रा के लिए गर्मियों का मौसम सबसे बेहतर होता है। वैसे मार्च महीने से जून महीने के बीच का समय और साथ में वसंत ऋतू में जुलाई महीने से अगस्त महीने तक का समय सबसे बेहतर माना जाता है।

कैसे पहुंचे वहां

कल्पेश्वर ऋषिकेश के पास पड़ता है। हवाई मार्ग से देहरादून एयरपोर्ट पहुँच कर वहां से ऋषिकेश सड़क मार्ग से और फिर कल्पेश्वर तक की 42 किलोमीटर तक की यात्रा सड़क मार्ग से की जा सकती है। वहीं रेल मार्ग से ऋषिकेश या फिर हरिद्वार स्टेशन पहुँच कर सड़क मार्ग से कल्पेश्वर तक पहुंचा जा सकता है।

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